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मेरा देश बदल रहा है, तालिबानीकरण की तरफ बढ़ रहा है? मेरा देश वाक़ई बदल रहा है?

Posted On: 8 Jun, 2016 में

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मेरा देश बदल रहा है, तालिबानीकरण की तरफ बढ़ रहा है? मेरा देश वाक़ई बदल रहा है?
वर्तमान हालात पर यह लिखने को क़लम बैचेन है कि आजाद भारत विधिक विचारक क्रांति सत्याग्रही – जी हाँ, यही नाम है उनके, जो मथुरा में “सत्याग्रह” कर रहे थे। इन सत्याग्रहियों का पुलिस से टकराव हुआ और मथुरा में एसपी, एसएचओ समेत 24 लोगों की जान चली गई। 24 इंसानी जानें।
हर शहीद को हमारी हार्दिक श्रध्दांजली।
मीडिया बता रहा है – “करीब दो साल पहले, बाबा जय गुरुदेव से अलग हुए समूह के कार्यकर्ताओं ने खुद को ‘आजाद भारत विधिक विचारक क्रांति सत्याग्रही’ घोषित किया था और धरने की आड़ में जवाहर बाग की सैकड़ों एकड़ भूमि पर कब्जा कर लिया था।” पुलिस यह अतिक्रमण हटाना चाहती थी।सत्याग्रही असलहों के साथ सत्याग्रह पर आमादा हो गए।सत्याग्रही और असलहे? हर धर्मगुरु की अपनी निजी सेना? संविधान और देश की सुरक्षा व्यवस्था के ऊपर।
अब हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं हम, जब अवैध वसूली को “प्रोटेक्शन मनी”, गुंडे को “श्रीमान रक्षक” और हत्यारे को “श्रीमान विचारक”, झूठे को “योग्य नेता” और जुमलेबाज़ को “कुशल वक्ता” मानने लगे हैं।
जब सारे अर्थ बदल रहे हैं तो सत्याग्रह, रक्षक, स्वयंसेवक, समाजवादी आदि-आदि क्यों अपने मूल अर्थों के साथ चिपके रहें।क्योंकि मेरा देश ही बदल रहा है।
बजरंग दल, शिव दल, राम दल, रक्षक दल, शांति दल, क्रांति दल, सद्भावना दल या सेना- न जाने कितने नाम हैं और अब ये सड़कों पर ही न्याय कर रहे हैं।
अभी कुछ दिन पहले किसी गोरक्षा दल ने राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में, और किसी सेना ने महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में “समाज और धर्म की सेवा” करते हुए फौरन सुनवाई, फौरन न्याय, निर्णय और फौरन सजा का उदाहरण प्रस्तुत किया ही था।
कल तक भक्तों को लग रहा था कि ठीक है इन मुसलमानों को सबक सिखाया जाना ही चाहिए। कल तक “खून नहीं खौले, खून नहीं वो पानी है।” के नारे थे। आज खून का रंग तो न बदला, मज़हब बदला हुआ है। अब भक्त क़बीले को क़ानून के राज की याद आने लगी है।
इस दृष्टि-दोष के शिकार उच्च वर्ग और मध्यवर्ग का जो हिस्सा धर्म और राजनीति के इस ज़हरीले गठजोड़ को आज सींच रहा है। वह नादान, यह समझ नहीं रहा है कि कल जब आग फैलेगी तो उसके अपने बच्चे भी इससे बच नहीँ पाएँगे। फिर चाहे कोई मजहब हो, कोई जाति हो, कोई भाषा हो या कोई इलाक़ा हो?
धर्म के नाम पर वोट बटोरे जा सकते हैं, लेकिन धर्मांध लोगों को बेहतर इंसान नहीं बनाया जा सकता।इतिहास गवाह है कि जब भी किसी मज़हब का इस्तेमाल हुकूमत हासिल करने या उसे मज़बूत करने के लिए हुआ, इंसानियत खून के आंसू रोई।
आप घर में खूब घण्टा बजाईये, कौन सुन रहा है? सड़क पर आएंगे तब बात बनेगी। मथुरा कांड का महानायक (?) भी लंपटिया राष्ट्र भक्ति का गुणगान किया करता था।वह बाबा जयगुरुदेव की छोड़ी विरासत की कड़ी में से एक था।
मीडिया और विपक्षी पार्टियों के निशाने पर मुख्यमंत्री अखिलेश हैं। उ.प्र.में चुनाव का मौसम दस्तक दे चुका है। सरकार जब कभी कार्यवाही करती और कुछ ऊंच नीच होती तो सरकार का हिन्दू विरोधी होना तय हो जाता है। वैसे भी यह सरकार उदार हिंदुत्व को अंगीकार करने के चक्कर में और हिन्दूवादी राजनीति की लाटरी खुल जाने से नये गुणा भाग में व्यस्त है।मीडिया में चर्चा अखिलेश सरकार की नाकामी के रूप में अधिक है।
बजरंग दल, दुर्गा वाहिनी के सैन्य शिविरों के बावजूद इससे कट्टर हिन्दू समाज के हिन्दू तालिबानीकरण की एक श्रंखला के रूप में देखने से हर कोई आंख चुरा रहा है। हिन्दू आतंकवाद का शब्द तो पूरी तरह बैन पहले भी किया जा चुका है।
ये सब सत्याग्रही थे जो इतने हथियारों के ज़खीरे और दो पुलिस अधिकारियों, कुछ पुलिसवालों और आम नागरिकों को मिला कर दो दर्जन से ज़्यादा इंसानों की हत्या के बाद भी आतंकवादी नहीं कहे जा सकते। क्योंकि इस शब्द की उत्पत्ति तो सिर्फ मुसलमानों के लिये की गई है,दूसरे समुदाय पर इसे कैसे थोपा जा सकता है?
प्रदेश सरकार इसे इंटैलीजैंस फेलियर बता रही है,यह तो हमेशा ही पूरे देश में राष्ट्र भक्तों (?) के मामले में जानबूझ कर किया जाता है। मसलन बाबा रामपाल, बाबा राम रहीम, आशाराम बापू के समर्थकों का उपद्रव, हरियाणा का जाट आंदोलन मुज़फ्फरनगर दंगे आदि आदि। क्योंकि इंटैलीजैंस को,पुलिस को जो चश्मे सप्लाई किये गये हैं वे केवल मुसलमानों के मामलों में सही देखते हैं। बाक़ी ज़्यादातर मामलों में आउट ऑफ़ फॉकस हो जाते हैं।
बड़ा सवाल ये है कि हिन्दू तालिबानीकरण को, मुसलमानों को सबक़ सिखाने की जिस मानसिकता के चलते पुलिस और प्रशासन हमेशा नज़रअंदाज़ करते आये हैं, वह अब पुलिस, प्रशासन एवँ क़ानून और व्यवस्था के लिये सिर दर्द बन चुका है। वह उनके खून से होली खेलने लगा है और आने वाले समय में और भी बड़ा सिरदर्द बनने वाला है। क्योंकि यह ज़हरीला नाग मज़हब नहीं, मज़हब की सियासत की देन है।
आज हक़ीक़त में सार्वजनिक जीवन में मज़हब की कोई उपयोगिता बची हो तो बताइए?
फिर मेरा देश तो बदल ही रहा है। देखना यह है कि वह इराक़, सीरिया, अफगानिस्तान, फिलीस्तीन, इज़राईल या पाकिस्तान में से किस देश का स्वरूप लेता है? हमारे हुक्मारां उन्हीं गलतियों को दोहरा रहे हैं , जो इन मुल्कों ने की और खामियाज़ा आज भी भुगत रहे हैं। अब हम उसी रास्ते पर गामज़न है तो ऐसे हालात में हमारा अज़ीम देश विश्व नेतृत्व की क्षमता तो निश्चित ही खो देगा, ऐसा मेरा मानना है। इस जुमले बाज़ और लफ्फाज़ केंद्र सरकार के दो वर्षीय कार्यकाल में “विकासशील देश” का तमगा तो उससे छीना ही जा चुका है। प्रधानमन्त्री जी के भ्रष्टाचार और अपराधीकरण रोकने के दावे को भा.ज.पा. की मध्य प्रदेश सरकार के व्यापम घोटाले और भा.ज.पा. के क़द्दावर नेता एकनाथ गड्से जैसे लोगों ने तार – 2 कर दिया है।
इसलिए अब भी समय है, जितनी जल्दी हो जागो देशवासियो, कोई देवी, देवता, पीर और पैगम्बर नहीं आएगा। तुम्हें जागना ही होगा और छद्म राष्ट्रवादियों, छद्म जेहादियों और छद्म हिन्दुत्वादियों से देश को बचाना होगा। ताकि यह अज़ीम देश विश्व नेतृत्व कर सके और इसकी महानता क़ायम रहे।
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सैयद शहनशाह हैदर आब्दी
समाजवादी चिंतक-झांसी।
शिविर : 400 के.वी. उपकेंद्र
गुजरात इनर्जी ट्रांसमीशन कम्पनी लिमिटेड – कासोर।
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jago hindu jago.

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
June 10, 2016

जय श्री राम सैयद्जी ये बिलकुल सच से कोसो दूर है ऐसी भाषा तालिवान ,पाकिस्तान और मोदीजी के विरोधी करते जिनको देश के अच्छे कार्य दीखते नहीं विश्व में देश की बढ़ती प्रतिष्ट से जिन्हें जलन होती है वैसे देश में रहने वाले बहुत से मुसलमानों को मोदी/बीजेपी/हिन्दुओ के विरोध की बेमारी लग गयी.

Shobha के द्वारा
June 9, 2016

श्री सैयद जी लिखने वाले को कभी बायस नहीं होना चाहिए | भारत अब विकसित देशों की श्रेणीं में आचुका है उसका नम्बर दसवां है जितना आतंकवाद देश ने झेला है जितनी देश की डेमोक्रेसी को बचाने के लिए देश ने शहादत दी है वह आपने शायद नहीं पढ़ी


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