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खुशियां बांटने का पर्व है ईद-उल-फितर !

Posted On: 7 Jul, 2016 में

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खुशियां बांटने का पर्व है ईद-उल-फितर !
हम एक बनें, नेक बने – बस यही दुआ है.
इस्लाम धर्म में पवित्र रमजान के पूरे महीने रोजे अर्थात् उपवास रखने के बाद नया चांद देखने के अवसर पर “ईद-उल-फितर” का त्योहार मनाया जाता है। यह रोजा तोडऩे के त्योहार के रूप में भी लोकप्रिय है। यह त्योहार रमजान के अंत में यकुम (एक) शव्वाल-अल-मुकर्रम को मनाया जाता है। शव्वाल-अल-मुकर्रम — इसलामी कैलंडर का दसवां महीना है। इसलामी कैलंडर के सभी महीनों की तरह यह भी नए चाँद के दिखने पर शुरू होता है। उपवास की समाप्ति की खुशी के अलावा इस ईद में मुसलमान अल्लाह का शुक्रिया अदा इसलिए भी करते हैं कि उन्होंने महीने भर के उपवास रखने की शक्ति दी। मुसलमानों का त्योहार ईद मूल रूप से भाईचारे को बढ़ावा देने वाला त्योहार है। इस त्योहार को सभी आपस में मिल के मनाते है और खुदा से सुख-शांति और बरकत के लिए दुआएं मांगते हैं। पूरे विश्व में ईद की खुशी पूरे हर्षोल्लास से मनाई जाती है। इसलामी साल में दो ईदों में से यह एक है। दूसरा ईद उल जुहा या बकरीद कहलाता है। पहला ईद उल-फ़ितर पैगम्बर मुहम्मद ने सन 624 ईसवी में जंग-ए-बदर के बाद मनाया था।

मुस्लिम धर्मावलंबियों के लिए यह अवसर भोज और आनंद का होता है। ‘फितर’ शब्द अरबी के ‘फतर’ शब्द से बना। जिसका अर्थ होता है टूटना। ‘फितर’ शब्द का एक अन्य अर्थ भी होता है जो ‘फितरह’ शब्द से निकलता है। जिसका अर्थ होता है भीख या दान। अन्य इस्लामी त्योहारों की तरह रमज़ान एक दिन विशेष पर नहीं आता है। यह इस्लामी केलेंडर का नौवां महीना होता है। इस प्रकार यह पूरा माह ही त्योहारों की तरह होता है। इबादत या प्रार्थना, भोजन और मेल-मिलाप इस त्योहार की प्रमुख विशेषता है।

इस दिन की रस्मों में सुबह सबसे पहले नहाना, नए कपड़े पहनना, सुगंधित इत्र लगाना, ईदगाह जाने से पहले खजूर खाना आदि मुख्य है। आमतौर पर पुरुष सफेद कपड़े पहनते हैं। सफेद रंग पवित्रता और सादगी का प्रतीक है। इस पवित्र दिन पर बड़ी संख्या में मुस्लिम अनुयायी सुबह जल्दी उठकर ईदगाह, जो कि ईद की विशेष प्रार्थना के लिए एक बड़ा खुला मैदान होता है, में इबादत और नमाज अदा करने के लिए इकट्ठे होते हैं। ईद के दौरान लज़ीज़ खाने के साथ परिवार और दोस्तों के बीच तोहफ़ों का आदान-प्रदान होता है। सिवैया इस त्योहार की सबसे जरूरी खाद्य पदार्थ है जिसे सभी बड़े चाव से खाते हैं।

नमाज से पहले सभी अनुयायी शरीयत के अनुसार, गरीबों को अनाज की नियत मात्रा या उसके सम्तुल्य राशि दान देने की रस्म निभाते हैं। जिसे “फितरा देना” कहा जाता है। फितरा-एक धर्मार्थ उपहार है, जो रोजा तोडऩे के उपलक्ष्य में दी जाती है। इसके बाद इमाम द्वारा ईद की विशेष इबादत और दो रकत नमाज अदा करवाई जाती है। ईदगाह में नमाज की व्यवस्था इस त्योहार विशेष के लिए होती है। अन्य दिनों में नमाज मस्जिदों में ही अदा की जाती है।

सोचें, क्या हम “ ईद मुबारक “ कहने के हक़दार हैं?

“ईद-उल-फितर” के तआल्लुक़ से हमें बेशुमार हदीसें मिलती हैं और हम पढ़ते और सुनते रहते हैं लेकिन क्या हम इस पर अमल भी करते हैं। ईमानदारी के साथ हम अपना जायजा लें कि क्या वाकई हम लोग मोहताजों और नादार लोगों की वैसी ही मदद करते हैं जैसी करनी चाहिए? सिर्फ सदक़ा-ए-फित्र देकर हम यह समझते हैं कि हमने अपना हक़ अदा कर दिया है। जब अल्लाह की राह में देने की बात आती है तो हमारी जेबों से सिर्फ चंद रुपए निकलते हैं, लेकिन जब हम अपनी खरीदारी के लिए बाज़ार जाते हैं वहाँ हज़ारों रुपया खर्च कर देते हैं। कोई ज़रूरतमंद अगर हमारे पास आता है तो उस वक़्त हमको अपनी कई ज़रूरतें याद आ जाती हैं। यह लेना है, वह लेना है, घर में इस चीज़ की कमी है। बस हमारी ख्वाहिशें खत्म होने का नाम ही नहीं लेती हैं।
खासतौर से हमारी बहनें ईद की शॉपिंग का जायज़ा लें कि वह अपने लिबास पर कितना कुछ खर्च करती हैं। ज़रा रुक कर सोचें हममें से कई ज़रूरतमंद लोग दुनियां में मौजूद हैं जिनके पास तन ढँकने के लिए कपड़ा मौजूद नहीं। अगर इस महीने में हम अपनी ज़रूरतों और ख्वाहिशों को कुछ कम कर लें और यही रकम ज़रूरतमंदों को दें तो यह हमारे लिए बेहद अज्र और सिले का बाइस होगा। क्योंकि इस महीने में की गई एक नेकी का अज्र कई गुना बढ़ाकर अल्लाह की तरफ से अता होता है।

अपने कलमागो भाई – बहनों से हमारी दस्तबस्ता गुज़ारिश है,” पहले ईमानदारी इबादत करें। ज़रूरतमन्दों, ग़रीबों की मदद करें। उन्हें तोहफे दें न कि सियासतदानों और रसूख़दारों को। अपनी सभी दीनी और दुनियावी ज़िम्मेदारियों को पूरा करें। फिर गुनाहों की दिल से तौबा करें। मुस्तक़बिल में इन गुनाहों और ग़लतियों को न दोहरायें। “तब कहें-रमज़ान मुबारक/ ईद मुबारक !”

इससे न सिर्फ आपका भला होगा बल्कि आपके ख़ानदान, मोहल्ले, शहर, सूबे और मुल्क के साथ दुनिया का भी भला हो सकेगा। यह ज़मीन ह्क़ीक़त में अमन, इंसानियत, भाई चारगी और मोहब्बत का गहवारा बन जायेगी।
आईये आज से ही शुरूआत करते हैं फिर कहेंग़े, रमज़ान / ईद तहेदिल से मुबारक, तहेदिल से मुबारक – मुबारक मुबारक!

-सैय्यद शहनशाह हैदर आब्दी
समाजवादी चिंतक
निवास-“काशाना-ए-हैदर”
291-लक्ष्मन गंज – झांसी (उ0प्र0)-284002.
मो.न. 09415943454.
Eid Mubarak.

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
July 8, 2016

ईद मुबारक हो जनाब । आपके ख़यालात बहुत उम्दा हैं । ज़िंदगी के हल पहलू के मुताल्लिक ऐसा नज़रिया तो हर इंसान का होना चाहिए । और ऐसा नज़रिया रखने वाले इंसान ही सही मायनों में इंसान कहलाने के हक़दार हैं ।


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