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गौ रक्षा, आस्था का प्रतीक या आतंक का ? “एक ओर ‘गौ रक्षा’ का पाखण्ड, दूसरी ओर ‘बीफ निर्यात’ में देश नम्बर-वन।“ भाई वाह बहुत ख़ूब!

Posted On: 6 Aug, 2016 में

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गौ रक्षा, आस्था का प्रतीक या आतंक का ?

एक ओर ‘गौ रक्षा’ का पाखण्ड, दूसरी ओर ‘बीफ निर्यात’ में देश नम्बर-वन। भाई वाह बहुत ख़ूब!

मशहूर साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द कहते हैं,”साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है, उसे असली रूप में निकलते हुये शायद लज्जा आती है, इसलिये वह संस्कृति की खाल ओढ कर आती है।“

वर्तमान में भारत में गाय को लेकर हो रही सियासत के घमासान को समझने के लिये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सबसे लम्बे समय तक सर संघचालक रहे माधव सदाशिव गोलवरकर उर्फ गुरू जी के मत को समझना होगा, वो कहते हैं,” हमारे राष्ट्रीय जीवन के सम्मान का प्रतीक गौ माता है, मातृभूमि की यह जीती जागती प्रतीक पूजा और सम्मान की हक़दार है। हमारे राष्ट्रीय सम्मान से जुडे इस महान क्षण में होने वाले किसी भी आक्रमण को रोकने और मातृभूमि के प्रति सम्मान की भावना को बढाने के लिये स्वराज के पुन:जागरण के हमारे राष्ट्रीय कार्यक्रम में गौ-वध पर प्रतिबंध सर्वोच्च प्राथमिकता में होना चाहिये।“  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सर संघचालकों के लिये गाय की पूजा, अल्पसंख्यकों के खिलाफ आवाज़ उठाने की एक और वजह बन गई, ताकि वे स्वीकार करें कि हिंदुस्तान एक हिंदु राष्ट्र है।

भारत में गौमांस (बीफ़)  एक संवेदनशील मुद्दा है। मुसलमानों को इसमें जोड़ दो तो फिर तथ्यों से जुड़ी और स्वस्थ बहस तो हो ही नहीं सकती। भारत में गौमांस खाने के मामले में भी यही हो रहा है। आज गौमांस न सिर्फ़ मुसलमान बल्कि दलित, आदिवासी, इसाई और उत्तर-पूर्व के निवासी भी खाते हैं। दलितों के लिए यह प्रोटीन का सबसे सस्ता स्रोत है।

सन 2014 में नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत से भाजपा की सरकार बनते ही हिंदु समाज का एक संकीर्ण तबक़ा यह मान बैठा है कि यह जनादेश ‘हिंदु राष्ट्र’ के लिये मिला है। इसी लिये गाय के सम्मान और उसकी पूजा पर ज़ोर दिया जा रहा है। अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों और दलितों पर हमले इसी सोच का नतीजा हैं। इन हमलों का विरोध करने वालों को ‘छ्द्म धर्मनिरपेक्ष’ या ‘राष्ट्रद्रोही’ कहकर खारिज कर देना, संविधान की अवहेलना जैसी खतरनाक प्रवृत्ति का घोतक है। हमारा मानना है कि हिंदुत्व के स्वयं भू ठेकेदारों द्वारा गौरक्षा के नाम पर दलितों पर अत्याचार हिन्दू धर्म के वास्तविक रक्षकों पर ही अत्याचार है। वोट हासिल करने हों तो दलित भी हिन्दू, उसके बाद अछूत ? दंड और प्रताड़ना के अधिकारी, वाह रे पाखंड।

जहां तक इतिहास का सवाल है वह हमसे एकदम जुदा कहानी कहता है। हमारे अल्प ज्ञान के अनुसार भारत के सबसे महान धर्म निरपेक्ष संतों में से एक और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुताबिक हिंदुत्व के व्याख्याता स्वामी विवेकानंद का इस मामले में कुछ और ही विचार है। अमरीका में अपनी दूसरी यात्रा के दौरान उन्होंने जानबूझकर इस विषय पर सच बोला, जिसे हिंदू दक्षिणपंथी आसानी से भूल जाते हैं। स्वामी विवेकानंद ने कैलिफ़ोर्निया के शेक्सपीयर क्लब में ‘बौद्ध भारत’ विषय पर बात की थी। उन्होंने प्राचीन भारत में हिंदुओं के गौमांस खाने के मुद्दे पर जो सच बोला, वह उनके लिए ज़रूर धक्का होगा जो भारत में गौमांस खाने के लिए मुसलमानों को ज़िम्मेदार बताते हैं। सिस्टर निवेदिता और स्वामी तुरियानंद के साथ उन्होंने उपस्थित लोगों को बताया, “आप लोग यह जानकर चकित रह जाएंगे कि पुराने संस्कारों के अनुसार जो गौमांस नहीं खाता था वह अच्छा हिंदू नहीं था। कुछ विशेष अवसरों पर हमें सांड को मारकर उसे खाना होता था।”

(स्वामी विवेकानंद, स्वामी विवेकानंद का संपूर्ण साहित्य- वॉल्यूम 3. पृष्ठ 536).

बाद में इसकी पुष्टि स्वामी विवेकानंद के स्थापित रामकृष्ण मिशन के प्रायोजित शोध कार्यों में अन्य लोगों ने भी की। वैदिक भारत के जाने-माने विद्वान सी. कुन्हां राजा ने लिखा, “वैदिक आर्य, जिनमें ब्राह्मण भी शामिल थे मछली, मांस और तो और गौमांस भी खाते थे। विशिष्ट अतिथि को खाने में गौमांस परोस कर सम्मान दिया जाता था। हालांकि वैदिक आर्य गौमांस खाते थे, पर दुधारू गाय को मारा नहीं जाता था।”

भारत में कुछ राज्यों को छोड़ कर लगभग सभी जगह गोहत्या पर 1976 से ही प्रतिबंध है। इसके बावजूद कुछ राज्यों में बैल और बछड़े को काटने की इजाज़त रही है। 2012 में हुए पशुओं की गणना के अनुसार भारत में गोवंश की तादाद 1951 में सबसे अधिक 53.04 प्रतिशत थी। साल 2012 में ये घटकर 37.28 प्रतिशत पर आ गई। तो सवाल ये उठता है कि भारत में जब गोहत्या पर प्रतिबन्ध है तो फिर इनकी जनसंख्या में इतनी कमी क्यों आई?

भारत से गौमांस (बीफ़) का निर्यात करने वाले कारोबारी इसकी वजह बताते हैं कि प्रतिबंध की वजह से किसान अपनी दूध न देने वाली गायों को बेच नहीं पाते हैं, इसलिए उन्हें पालने या ज़िंदा रखने में उनकी कोई रुचि नहीं। इसके अलावा अब खेती के मशीनीकरण के बाद जानवरों का इस्तेमाल नहीं के बराबर हो रहा इसलिए जो बछड़े और बैल क़साइयों के ज़रिए किसान के काम आ सकते थे, उन्हें ज़िंदा रखने में किसान को कोई लाभ नहीं। यही वजह है कि संरक्षण के बावजूद गोवंश की तादाद घट रही है। हालांकि 1951 में जहाँ भैंसों की जनसंख्या सभी जानवरों में से 14.82 प्रतिशत थी वो 2012 में बढ़कर 21.23 प्रतिशत हो गई।

मांस के कारोबार से जुड़े व्यापारी मानते हैं कि इस धंधे में सिर्फ एक ही समुदाय के लोग नहीं हैं। इसका धर्म से कोई नाता नहीं है। छ: बड़े बीफ निर्यातकों में चार हिन्दू हैं।  लगभग 28 हज़ार करोड़ से ज़्यादा रुपए के इस व्यवसाय में मुनाफे के एक बड़े हिस्सेदार ग़ैर-मुसलमान व्यापारी भी हैं। सुनील कपूर की अरेबियन एक्सपोर्ट मुम्बई, अतुल, सुभाष और सतीश सभरवाल की अल कबीर एक्सपोर्ट्स हैदराबाद, अजय और सुनील सूद की अल नूर एक्सपोर्ट नई दिल्ली, मदन एबोट की एम.के.आर.फरोज़न फ़ूड नई दिल्ली, ऐ.एस.बिंद्रा की पी.एम.एल. इण्डस्ट्रीज़ प्रायवेट लिमिटेड चंडीगढ़ और महेश जगदाले एंड कंपनी मुम्बई आदि, बीफ़ एक्सपोर्ट से जुड़े इन नामों से ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है। भारत में एक अनुमान के अनुसार कुल 3600 बूचड़खाने सिर्फ नगरपालिकाओं द्वारा चलाये जाते हैं। इनके अलावा 42 बूचड़खाने ‘आल इंडिया मीट एंड लाइवस्टॉक एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन’ के द्वारा संचालित किये जाते हैं जहां से मांस सिर्फ निर्यात किया जाता है। 32 ऐसे बूचड़खाने हैं जो भारत सरकार के एक विभाग के अधीन हैं। महाराष्ट्र, पंजाब और उत्तर प्रदेश तीन ऐसे प्रमुख राज्य हैं जहाँ से सबसे ज़्यादा भैंस के मांस का निर्यात होता है। अकेले उत्तर प्रदेश में 317 पंजीकृत बूचड़खाने हैं।

यह एक हक़ीक़त है कि भारत में सबसे पहले जिन लोगों ने गो मांस खाना शुरू किया था, वे न तो ईसाई थे और न ही मुसलमान। वे आम लोग थे जिनमें सभी जातियों के लोग शामिल थे। मांस खाने के खिलाफ आदि शंकराचार्य की मुहिम शुरू होने तक जैन बनियों को छोड़कर द्विज भी गो मांस खाते थे। इसी के बाद से ब्राह्मणों और अन्य बनियों ने गो मांस खाना छोड़ा। हालांकि कई दलित जातियां, आदिवासी समुदाय और कई अन्य पिछड़ी जातियां अभी भी गो मांस खाती हैं। इसके अलावा वे भेड़ का मांस, मुर्ग़ा और मछली आदि भी खाते हैं। ज़्यादातर कश्मीरी पंडित आज भी मांसाहारी हैं। बंगाली ब्राह्मण मछली भी खाते हैं और मांस भी।

क्या बीजेपी और संघ परिवार इन सभी चीजों पर रोक लगाएगा जिनमें भेड़, बकरियां, मुर्गे-मुर्गियां और मछलियों का जीवन शामिल हैं? इंसानों के खान-पान की संस्कृति के संबंध में वे हिंसा और अहिंसा के बीच की लकीर कहां खींचेंगे?

एक तरह से देखा जाए तो वे जो कुछ कर रहे हैं मानो सरकार ने एक शाकाहारी ब्राह्मण की जिम्मेदारी ले ली हो और वह अपने खान-पान की संस्कृति पूरे समाज पर थोप रही हो।

बीफ़ बैन हज़ारों के रोज़गार पर संकट पैदा कर देगा। इनमें बीफ के व्यंजन बेचने वाले होटल, रेस्तरां, चमड़े की वस्तुओं के व्यापारी और कुरैशी समाज के करोड़ों लोग हैं- जो बैल काटने का काम करते हैं । देश के कई शहरों में चमड़े का व्यापार बड़े पैमाने पर होता है । यहां शुद्ध चमड़े से बनी बेल्ट, लेडीज़ बैग, पर्स जैसी अन्य चीज़ें मिलती हैं । चमड़े की वस्तुओं का व्यापार करने वाले कहते हैं, “हमारे बाज़ार की ज्यादातर चीज़ें बैल के चमड़े से बनती हैं. बीफ बैन लागू हो जाने के बाद हमारा सारा व्यापार ही बंद हो जाएगा। चमड़ा व्यापारियों को डर है कि इस के लागू होने के बाद उनके लिए भुखमरी की नौबत आ जाएगी। व्यापारियों का कहना है कि , “हम कई पुश्तों से यह व्यापार कर रहे हैं। अब अचानक यह काम छोड़ कर हम दूसरा काम भी शुरू नहीं कर सकते। हमारा जमा जमाया व्यापार मिट्टी में मिल जाएगा और हम सड़क पर आ जाएंगे।” मुंबई सबर्बन बीफ ट्रेडर्स एसोसिएशन के मुताबिक कोलकाता और चेन्नई के चमड़े के कारखानों को जानवरों की खाल की आपूर्ति मुंबई और महाराष्ट्र से होती है। देवनार बूचड़खाने से एक दिन में करीब 450 खालें इन शहरों में भेजी जाती है। एक खाल की कीमत करीब 1,500 रुपए होती है। चूंकि अब महाराष्ट्र में बैल काटने पर पाबंदी लगी है, यह कीमत अब 2,000 से भी ज्यादा होगी। अब इस चमड़े की कीमत में इजाफ़े की वजह से यहां व्यापार पर बुरा असर पड़ेगा। देवनार बूचड़खाने में साल भर में करीब 24 करोड़ रुपये की खाल का व्यापार होता है। अब यह सब बंद हो जाएगा। एक अनुमान के अनुसार सिर्फ मुंबई में हर रोज़ करीब 30 लाख रुपए के बैल के मांस की बिक्री होती है। देवनार बूचड़खाने में कटने वाले 450 जानवरों के अलावा इतने ही जानवर ग़ैरकानूनी तरीके से कट कर रोज़ मुंबई में आते हैं, जिनका मांस शहर के हर उस होटल में जाता है जहां बीफ़ खाने लोग आते हैं। एक बैल के मांस की औसत कीमत तीन हज़ार रुपए होती है। मुंबई शहर में और आस-पास के इलाकों में एक दिन में औसत एक हज़ार बैल काटे जाते हैं जिनका सारा मांस मुंबई के अलग अलग होटलों में भेजा जाता है।

“कुल मिलाकर चमड़े और मांस का सालाना 1.5 अरब रुपये का व्यापार अब ठप हो सकता है। होटलों के अलावा बैल का मांस, ज़ू और नेशनल पार्क के टाइगर और लॉयन सफारी में जानवरों को खिलाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। इनका भोजन क्या होगा? है जवाब, गौ रक्षक रण बांकुरों और गाय के नाम पर सियासी रोटी सेंकने वाले संगठनो के पास ?”

चलिये धार्मिक, सामाजिक, व्यापारिक नफे नुक़सान की बात छोड़ते हुये गौ-माता की देश और समाज में वास्तविक स्थिति पर एक नज़र डालते हैं:-

एक लघु फिल्म द प्लास्टिक काऊ देखने का अवसर प्राप्त हुआ। यू-ट्यूब पर यह फिल्म उपलब्ध है। 35 मिनट की इस फिल्म में एक गाय का पेट चीर कर प्लास्टिक कचरे को काट काट कर निकाला जाता है, उसका वज़न 53 किलोग्राम बताया गया। उस गाय का पेट कभी भी फट सकता था। इस वीभत्स और भयानक दृश्य को देख कर हमारा दिल दहल गया। छद्म गौ रक्षक दलों की हिंसा के इतर, कुछ स्वयंसेवी संगठन इस तरह के गायों के पेट से कचरा निकालने का काम काफी समय से कर रहे हैं। गोवंश को बचाने को लेकर उनके जज़्बे को देखकर उनके प्रति मन स्वत: सम्मान से ओत प्रोत हो जाता है।

भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावेडकर जी ने पिछ्ले वर्ष एक ब्यान में कहा था,” सड़कों पर मरने वाली हर गाय के पेट से कम से कम तीस किलो प्लास्टिक कचरा, जिसमें चुनरी,ज़हरीले पदार्थ, लोहे की कीलें, तांबे के सिक्के तक शामिल हैं, मिलता है। इनसे गाय का आंतें फट जाती हैं और उनकी असमय मृत्यु हो जाती है।

चुनरी में बांध कर कौन लोग यह पूजा सामग्री नदी किनारे या सुनसान जगहों पर फेंकते हैं? क्या जाने –अंजाने यह गौ हत्या नहीं? क्या उपाय किये इन्हें रोकने के लिए, डण्डा भांजने वाले गौ रक्षक रण बांकुरों और गाय के नाम पर सियासी रोटी सेंकने वाली सरकार और संगठनों नें? सड़कों पर आवारा फिरने वालों, घायल, बीमार और बांझ गौवंश की सुरक्षा और इलाज की कितनी सुविधाओं का प्रबंध किया है, इन रण बांकुरों और इनका समर्थन करने वालों नें? जो आवारा जानवर खेत खलिहान, बंजर ज़मीनों, सड़कों, कूड़ा घरों के इर्द गिर्द तिल तिल कर मरते हैं, उनके प्रति यह कितने संवेदनशील हैं?

मोदी सरकार अगर गौरक्षा के लिये वास्तव में गम्भीर होती तो गौ-वंश का पंजीयन करा कर उनकी सुरक्षा कर सकती है, देश के बाक़ी सूबों में गौमांस और गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगा सकती है। मगर ऐसा करने से वोट के साथ, नोट ना मिलने का ख़तरा है। चुनाव के सुचारू संचालन के लिये नोट सबसे अहम होते हैं।  बीफ निर्यात में लगे ज़्यादातर लोगों की राजनैतिक प्रतिबध्दता जान लीजिये, हक़ीक़त समझ में आ जायेगी।

देश में जो दशा इन बेचारे जानवरों की है, वही दशा इन्हें देखने वाली संस्था “एनीमल वेल्फेयर बोर्ड ओफ इंडिया” की भी है। 2011-2012 में इसे 21.7 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ, जिसे 2015-2016 में घटाकर 7.8 करोड़ कर दिया गया, वो भी तब, जब गौ-रक्षकों की सरकार हैवन और पर्यावरण मन्त्रालय द्वारा भेजे गये इस फण्ड का 80% हिस्सा हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान की गौशालाओं की झोली में चला जाता है। देश में चार हज़ार से अधिक गौशालाओं में लगभग साढे तीन करोड़ गौवंश हैं। सड़कों, गली, कूचों, कूड़ाघरों के आस पास आवारा जानवरों की संख्या इनसे लगभग चार गुना ज़्यादा है । एक अंदाज़े के मुताबिक़ एक गाय पर रोज़ का ख़र्च कम से कम सौ रुपया है और केंद्र सरकार से मिलने वाली राशि है – मात्र दो रुपया वार्षिक। इसके ठीक उलट सरकार ने देश भर के क़साई खानों को आधुनिक बनाने में काफी मेहनत की है ताकि हम गौमांस निर्यात (बीफ एक्सपोर्ट) में पीछे ना रह जायें। यह सरकार की मजबूरी भी है, क्योंकि गौमांस आयात करने वाले देश, विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानकों का पालन करते हैं।

यह गौवंश की बदक़िस्मती है कि वधशालाओं के आधुनिकीकरण पर गौवंश रक्षक (?) सरकार करोड़ों खर्च कर रही है, बड़े उद्योगपतियों, पूंजीपतियों और कोर्पोरेट घरानों के कर और क़र्ज़ माफ करने के लिये सरकार के पास करोड़ों रुपये हैं। मगर गौमाता और आवारा पशुओं के संरक्षण के लिये उसके पास पैसे नहीं है। उस पर लफ्फाज़ियां,जुमलेबाज़ियां और नफरत का ज़हर – अल्लाह की पनाह। यह है गौवंश पर राजनीति करने वालों का असली चेहरा। इनकी धार्मिक आस्था की परीधि के अंदर गौवंश के साथ जो गुनाहे अज़ीम हो रहा है, उसके लिये कौन ज़िम्मेदार है? है जवाब छ्दम राष्ट्रवादियों और छद्म हिंदुत्व्वादियों के पास?

2014 चुनाव से पहले भाजपा में काऊ एंड डेवलेप्मेण्ट सेल के संयोजक मयंकेश्वर सिंह ने नारे दिये थे,”मोदी को मतदान –गाय को जीवनदान, बी जे पी का यह संदेश – बचेगी गाय, बचेगा देश। क्या हुआ उन नारों का? मोदी सरकार के आने के बाद 2014 में 4.8 अरब डालर का बीफ निर्यात हुआ, जो बासमती चावल के निर्यात से ज़्यादा है। आगे चलकर सन 2015 में 2.4 मिलियन टन बीफ निर्यात कर, हमारा देश बीफ निर्यात में दुनिया का अव्वल देश बन गया। भगवान राम के बाद अब गौ माता से यह संघ परिवार की धोखेबाज़ी नहीं? एक ओर गौ रक्षा का पाखण्ड, दूसरी ओर बीफ निर्यात में देश नम्बर-वन। भाई वाह बहुत ख़ूब! देश धर्म का नाता है – गाय हमारी माता है। का नारा लगाने वालों के राज में देश बीफ एक्सपोर्ट का सबसे बड़ा खिलाड़ी कैसे बन गया ? यह सवाल इन गौ भक्तों को हमेशा आईना दिखाता रहेगा।

ऊपर से सरकार क्या बनी, गांव देहात और क़स्बों में जो लोग गौवंश ढोंने का काम करते हैं, उनकी शामत आई हुई है। उनसे पिटाई के साथ जबरन अवैध वसूली की जा रही है। सरकार के पास इसके आंकडे तक नहीं  कि देश  भर  में  गौ रक्षा के नाम पर कुकर्मुत्तों की तरह उग आये संगठनों की राज्यवार संख्या कितनी है? गौ रक्षा के नाम पर कंगारू कोर्ट चल रही हैं, दर्जनों गौ रक्षक दल केंद्रीय मन्त्रालयों के चिन्ह का दुरुपयोग कर रहे हैं। इस जंगलराज में अब लड़ाकी महिलाओं को भी उतार दिया गया है। 27 जुलाई 2016 को मंदसौर रेल्वे स्टेशन की शर्मनाक घटना इसका सटीक उदाहरण है। सरकार, पुलिस, स्वयं संज्ञान लेने वाले न्यायालय मूक दर्शक हैं। मोदी सरकार – संघ, हिंदु महा सभा, बजरंग दल, विश्व हिंदु परिषद, दुर्गावाहिनी, गौ रक्षक दल और इन जैसे अन्य संगठनों से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष जुड़े लोगों पर कठोर कार्यवाही करे तो कैसे? यही तो इनका स्थाई वोट बैंक है। दूसरे दलों पर वोटों के तुष्टीकरण का आरोप लगाने वाले, आज खुद उसी राह पर गामज़न हैं। जो लोग मोदी सरकार के वर्तमान जनादेश को “हिंदु राष्ट्र” का जनादेश मानने की गलत फहमी पाल बैठे हैं। वे ही मोदी सरकार के लिये संवैधानिक संकट खड़ा करने की सबसे बड़ी वजह बनने वाले हैं। देशहित में सभ्य हिंदु समाज को इनके विरुध्द सीना तान कर खड़े होना और इन पर अंकुश लगाना होगा।

कल्पना कीजिये इनकी कारगुज़ारियों से पीड़ित समाज, तंग आकर और यह सोचकर कि,”यह ख़ामोश मिजाज़ी तुम्हें जीने नहीं देगी – इस दौर में जीना है तो कोहराम मचा दो।“  विरोध में खड़े हो गये और इनकी क्रिया की प्रतिक्रिया इन्हीं के अंदाज़ में देने लगे तो देश और समाज  किस संकट में पड़ जायेगा? इसका अंदाज़ा या तो इन छ्दम राष्ट्रवादियों और छद्म हिंदुत्व्वादियों को नहीं, या यह जान बूझकर अंजान बने हैं। दोनो ही स्थितियों में इस महान देश का विश्व नेतृत्व करने का सपना टूटना और विश्व समुदाय में देश की किरकिरी होना निश्चित है।

छ्दम राष्ट्रवादी और छद्म हिंदुत्व्वादी, गाय की रक्षा की आड़ में हिन्दुओं के वोट बटोरने के लिये मुसलमानों और दलितों के ख़िलाफ़ ख़ूनी राजनीति कर रहे हैं। देशहित में हम आपकी इस हिंसक राजनीति का पर्दाफाश ज़रूर करेंगे। साथ ही अनुरोध करेंगे कि आपका आचरण, दूसरे धर्मावलम्बियों को यह अहसास कराये कि गाय का सम्मान आप वास्तव में एक मां की तरह करते हैं। क्या भूखी गाय को पन्नी, गंदगी यहां तक की मैला खाते देख कर, अंजान बने रहना, मां का सम्मान है? क्या भूखी गाय को फल,सब्ज़ी या अन्य खाद्य पदार्थ की दुकान, ठेले या घर से बुरी तरह मार कर भगाना, घायल कर देना, मां का सम्मान है? घायल और बीमार गाय को सड़क पर तड़पते हुये मरने के लिये छोड़ देना, मां का सम्मान है? बांझ और बूढी गायों को क़साईयों के हाथों बेच देना, मां का सम्मान है?

करिये जन जागरण, हर गौ भक्त, अपने घर में एक बीमार, बांझ, बूढी और बेकार गाय को रख कर उसकी सेवा करेगा। गौ शालाओं से भी ऐसी गायें निकाली और बेची नहीं जायेंगी। मृत गायों का अंतिम संस्कार गौ रक्षक या परिवार वाले करेंगे आदि आदि।खड़ा कीजिये आंदोलन, आपके सक्रिय समर्थन, सहयोग और आशीर्वाद से बनी केंद्र सरकार के विरुध्द और उठाईये मांग कि वह सारी गौ वधशालायें, गौमांस, चमड़े और उससे बनी सामग्री की देश में बिक्री और निर्यात का कारोबार बंद करे।

फिर चलाईये गौ रक्षा अभियान और देखिये सर्वसमाज का सहयोग आपको मिलता है कि नहीं? वरना यह ढकोसलेबाज़ी और पाखण्ड बंद कीजिये। खुद भी चैन से रहिये, देश और समाज में भी चैन और सुकून रहने दीजिये।

इसी में देश की, समाज की, सबकी और आपकी भी भलाई है।

-सैय्यद शहनशाह हैदर आब्दी

समाजवादी चिंतकगौ वंश का सम्मान लाठियों और डंडों से पीट कर .

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