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देव में देव महादेव नीलकंठ नमोस्तु ते।

Posted On: 24 Feb, 2017 में

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महा शिवरात्रि Photo0134 दिनांक: 24.02.2017.

लोकमंगल के देव है शिव, हमें शिवजी से जीवन जीने की कला सीखने को मिलती है, शिव चरित्र में छुपे हैं सफल जीवन के सूत्र!!

हमारी अल्प ज्ञान के अनुसार शिव जी आदि देव हैं। भारतीय धर्म-दर्शन में शिव-पार्वती को समस्त विश्व का माता पिता माना गया है।

भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता और सौंदर्य चेतना के पोर-पोर में शिव निवास है, इसीलिए महाशिवरा‍त्रि पर भारतीय जन-जन शिवमय हो जाता है। महाशिवरा‍त्रि जघन्य पापों और महादुखों को नाश करने वाली रात्रि है।

शिव और शंकर का अर्थ शुभ या मंगलकारी तथा समृद्धि एवं प्रसन्नता को प्रदान करने वाला होता है। इस प्रकार स्पष्टत: शिव की अवधारणा में सर्वत्र कल्याण भाव की प्रधानता देखी जा सकती है।

शिव के नामों में उनके स्वरूप में निहित विभिन्न तत्वों का संकेत मिलता है। जगत के कल्याण हेतु विषपान करने वाले देवता के रूप में ‘नील कंठ’ शिव का स्वरूप कल्याण भाव की अभि‍व्यक्ति है। परोपकार के लिए विष पिया, इसे सर्व त्याग की शिक्षा मिलती है।

सर्पों की माला दुष्टों को भी गले लगाने की क्षमता दर्शाती है। कानों में बिच्‍छू और बर के कुंडल अर्थात कटु एवं कठोर शब्द सुनने की सहनशीलता ही सच्चे साधक की पहचान है। मृगछाल निरर्थक वस्तुओं की सदुपयोग और मुंडों की माला जीव की अंतिम अवस्‍था दर्शाती है। भस्म-लेपन शरीर की अंतिम परिणति दर्शाती है। इन्हें प्रसन्न करने के लिए इनके अनुकूल बनना पड़ेगा। व्यक्ति में राग, द्वेष, ईर्ष्या, वैमनस्य, अपमान तथा हिंसा जैसी अनेक पाशविक वृत्तियां रहती हैं। नीलकंठ स्वरूप हमें विपरीत परिस्थितियों में एवं विपरीत व्यवहार में भी अविचल रहने की प्रेरणा देते हैं।

यदि हमारी संस्कृति शिव का पर्याय है, तो इसी अर्थ में है कि भीतर के भक्ति जल को सहज भाव से छलका दीजिए। विकृतियों को धो डालिए। जो ऐसा करेगा, शिव उसे अपना लेते हैं।

राम-राज्य की कामना शिव ने प्रथम की। राम के स्वरूप का प्रसार भी शिव ने किया। वरदान देते समय सब कुछ दे देने वाला इनके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है। विष ‍पीना ही शंकर की शंकरता है। ऐसा कर हम भी पृथ्वी को स्वर्ग बना सकते हैं। प्रसन्न होने पर शिव अपने भक्तों को सभी कुछ प्रदान कर देते हैं।

देवदेव महादेव नीलकंठ नमोस्तु ते।
कुर्तमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव।।
तव प्रभावाद्धेवेश निर्विघ्नेन भवेदिति।
कामाद्या: शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि।।

अर्थात- ‘देवदेव! महादेव! नीलकंठ! आपको नमस्कार है। देव! मैं आपके शिवरात्रि-व्रत का अनुष्ठान करना चाहता हूं। देव आपके प्रभाव से मेरा यह व्रत बिना किसी विघ्न-बाधा के पूर्ण हो और काम आदि शत्रु मुझे पीड़ा न दें। इस भांति पूजन करने से आदिदेव शिव प्रसन्न होते हैं।

शिव पूजन में कोई भेद नहीं है। वे सबसे एक समान प्रसन्न होते हैं, क्योंकि सर्वेश्वर, महाकालेश्वर सबके हैं। यही कारण है कि उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम देश का ऐसा कोई भाग नहीं है, जहां शिव की उपासना न होती हो।

नाग पंथ से जुड़े मुस्लिम योगियों ने मध्यकाल में शिव को अपनाया है और वे शैव-योगी पंजाब से हिमाचल की तराई तक फैल गए। शिवपुराण, स्कंद पुराण और आगम ग्रंथों में शिव के आख्यान भरे पड़े हैं।

तमिल साहित्य में शिव चिंतन की एक अखंड परंपरा है। शिव पर संपूर्ण भारतीय भाषाओं के साहित्य में बड़ा भारी शोध कार्य हुआ है। रवीन्द्रनाथ जीवन के अंतिम दिनों में नटराज पर समर्पित हो गए थे, तो दिनकर हिमालय में ‘नाचो हे नाचो प्रलयंकार’ की आवाज लगा रहे थे।
फलत: शिव केवल कर्मकांड या रूढि़ नहीं हैं, न कोरा देवतावाद। वह कर्म-दर्शन का ज्ञान यज्ञ है जिसमें नई पीढ़ी की जागृति आवश्यक है। शिव को समझकर ही हम जीवन-जगत की समस्याओं को सुलझा सकते हैं।

आईये, भोले भण्डारी शिव शंकर की जीवन शैली से प्रेरणा लेकर जग कल्याण का कार्य बिना भेद भाव के करें। तब ही महा शिव रात्रि पर्व मनाना सार्थक होगा।

अनेक बिषमताओ के बीच सम भाव रखने वाले देवो के देव महादेव की जय हो।
महादेव जी, देश और समाज को झूठ बोलकर गुमराह करने और नफरत की सियासत करने वालों को भी सदबुध्दि दें।

इसी कामना के साथ, आपको, इष्ट मित्रों, परिवार और समस्त देशवासियों के साथ महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाऐं।

, (सैय्यद शहनशाह हैदर आब्दी)
समाजवादी चिंतक
सर्विस इंजिनियर
बाह्य अभियांत्रिकी सेवाऐं
भेल झांसी (उ0प्र0)

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